नियमों की अनदेखी: कोई अनहोनी होने के बाद ही जागते हैं जिम्मेदार स्कूल की छात्राओं के वाहनों में नहीं चलतीं महिला अटेंडर,छात्राओं से छेड़खानी की घटनाएं घटित होने की बढ़ी संभावनाएं

नियमों की अनदेखी: कोई अनहोनी होने के बाद ही जागते हैं जिम्मेदार स्कूल की छात्राओं के वाहनों में नहीं चलतीं महिला अटेंडर,छात्राओं से छेड़खानी की घटनाएं घटित होने की बढ़ी संभावनाएं

रायसेन।बड़े शहरों की तरह रायसेन शहर में भी निजी स्कूलों के वाहनों में स्कूल जाने आने वाली छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं घटित हो सकती हैं।क्योंकि रायसेन सिटी के ज्यादातर प्रायवेट स्कूल वाहनों में महिला अटेंडर नदारत रहती हैं।रायसेन शहर के कुछ बड़े स्कूलों के बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों से भी आना जाना करते हैं।जिनकी स्कूलों से दूरी लगभग 10 से 15 किमी है।

इनका कहना है....

हालांकि निजी स्कूल वाहनों की समय समय पर चैकिेंग होती है और जिन वाहनों में नियमों का पालन होते नहीं मिलता है।उन पर कार्रवाई भी की जाती है। जल्द ही अभियान चलाकर स्कूल वाहन में महिला अटेंडर सहित अन्य नियमों की जांच की जाएगीजगदीश सिंह भील जिला परिवहन अधिकारी रायसेन

दरअसल छात्राओं को स्कूल लाने, ले जाने के लिए लगे ऑटो, वैन और बसों के संचालन में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निदेर्शों का पालन नहीं हो रहा है। स्कूल बसों में महिला अटेंडर की नियुक्ति करने का आदेश भी सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल पहले दिया था।लेकिन उसका सख्ती से पालन आज तक कई स्कूल प्रबंधनों ने नहीं किया है और ऐसे में लगातार नियमों की अनदेखी की जा रही है।सूत्रों से मिली 

जानकारी के अनुसार रायसेन शहर में भी में लगभग 40 से ज्यादा छोटे—बड़े प्राइवेट सीबीएसई स्कूल संचालित किए जा रहे है।इनमें से करीब 20-25 बड़े स्कूल शहर से 10,15 और 18 किमी दूरी तक स्थित है। जहां तक विद्यार्थियों को स्कूल लाने, ले जाने के लिए कई तरह के वाहन दौड़ रहे है। पांच साल पहले जिला परिवहन विभाग द्वारा सभी प्राइवेट स्कूल बसों के मालिकों और स्कूल प्रबंधन को नोटिस भेजकर बसों में महिला अटेंडर की नियुक्ति कराने के निर्देश दिए गए थे।जो छात्राओं की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। किस महिला को अटेंडर बनाना है इसके अधिकार प्राइवेट स्कूल संचालकों को दिए थे।उनके पास ही मॉनिटरिंग का कार्य है, लेकिन शहर में संचालित कई स्कूल बसों में महिला अटेंडर को नियुक्त नहीं किया गया है। स्कूल बस, वैन, ऑटो में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जा रहा है। जिससे असुरक्षित सफर हर दम बच्चों की जान पर बना रहता है। वहीं इस मामले में जिला व पुलिस प्रशासन, परिवहन विभाग, यातायात पुलिस और स्वयं अभिभावक भी जागरूक नहीं हैं। ज्यादातर स्कूली वाहन वैन गैस से संचालित हो रही हैं। वहीं औपचारिकता पूरी करने के लिए उच्चाधिकारियों के निर्देश पर कभी कभार कार्रवाई की जाती है।

नहीं माना सुप्रीम कोर्ट का आदेश....

छात्राओं को बैठाकर ले जाने वाले अधिकतर स्कूली वाहनों में महिला अटेंडर नजर नहीं आती हैं।जिले के कई स्कूल ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया। पिछले साल भोपाल में छात्रा के साथ हुई घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया था।लेकिन अभी स्कूलों पर सख्ती नहीं बरती जा रही है।जिस वजह से वह मनमानी करने कर रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली द्वारा स्कूल वाहनों में बच्चों की सुरक्षा सहित उनकी सुविधा को लेकर गाइडलाइन जारी की गई थी।जिसमें वाहन की निर्धारित सीट क्षमता से अधिक बच्चों को नहीं बैठाना। स्कूलों में लगे सभी तरह के वाहनों का रंग पीला होना। प्रत्येक वाहन पर स्कूल वाहन लिखा होना चाहिए। जीपीएस सिस्टम लगा होना चाहिए।इसके साथ ही संबंधित स्कूल का नाम, टेलीफोन नंबर, चालक का नाम सहित उसका मोबाइल नंबर भी दर्ज होना जरूरी है।लेकिन यह सब कई प्रायवेट स्कूल भी वाहन पर लिखा दिखाई नहीं देता है।